Swabhimaan | स्वाभिमान
अक्टूबर 2016 की वह शाम… जब गंगा आरती की रोशनी पूरे वाराणसी को सुनहरा बना रही थी, उसी भीड़ के बीच एक लड़की भूख से लड़ रही थी — लेकिन हाथ फैलाकर नहीं। नैना… जिसने फेंका हुआ समोसा उठाने से इंकार कर दिया, क्योंकि उसके लिए भूख बड़ी थी… पर इज़्ज़त उससे भी बड़ी। उसी घाट पर खड़ा था आरव — अनुभूति हवेली का मालिक। पैसे की कमी नहीं थी… लेकिन दिल खाली था। उसने सिक्का नहीं फेंका। उसने काम दिया। भीख नहीं — मौका दिया। लेकिन जब समाज को सच पता चला… जब एक मां ने भीड़ के सामने थप्पड़ मारा… जब इज्जत फिर से टूटती नजर आई… तब बारिश में भीगा एक लड़का उसी घाट पर घुटनों के बल बैठकर बोला — “तुम मेरी जिंदगी हो।” स्वाभिमान सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है। यह भूख और इज़्ज़त के बीच की जंग है। यह समाज और इंसानियत की परीक्षा है। और यह साबित करती है — कि प्यार अंधा नहीं होता, वह पहचानता है।
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